Published on February 18th, 2014

                                        “संग्रह न श्रेष्ठ, न सुखदायी   वैभव संग्रह कर सकना सहृदय व्यक्ति के लिए संभव नहीं, संसार में इतना दुःख भरा पड़ा है कि उसे दूर करने के लिए संपदा तो क्या सहृदय  व्यक्ति अपना

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विषमता की खाई (The chasm of imbalance)

Published on February 18th, 2014

                                                 “विषमता की खाई विज्ञान की कृपा से अनेकानेक यंत्र निर्मित हुए हैं जो थोड़े समय में प्रचुर उत्पादन करते हैं। सौ आदमियों का काम सम्हालने वाली एक मशीन बाकी निन्यानवे व्यक्तियों को बेकार बनाती है और उन निन्यानवे व्यक्तियों द्वारा संभावित उपार्जन भी एक मालिक के पास चला जाता है।   मशीनों और यंत्रों

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सच्चे अर्थों में शूरवीर (A Truly Brave Person)

Published on February 6th, 2014

                                           “सच्चे अर्थों में शूरवीर पराक्रमों में सबसे अधिक महत्त्व का वह है जिसमें अपनी अनगढ़ आदतों को सुधारने का श्रेय पाया जा सके। बाहरी संघर्षों से जूझने और कठिनाइयों को हटाने में दूसरे लोग भी सहायता कर सकते हैं और परिस्थितिवश श्रेय भी मिल सकता है। किंतु अनुपयुक्त आदतों को बदलना मात्र अपने निजी

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नियमितता का अभ्यास एक श्रेष्ठ गुण (Practicing Regularity and Continuity is an Indispensable Virtue)

Published on November 4th, 2013

                         “नियमितता का अभ्यास एक श्रेष्ठ गुण मानवी प्रगति के मार्ग में अत्यंत छोटी किंतु अत्यंत भयानक बाधा है – अनियमितता की आदत। आमतौर से लोग अस्त-व्यस्त पाए जाते हैं। हवा के झोंके के साथ उड़ते रहने वाले पत्तों की तरह कभी इधर-कभी उधर फुदकते-फुदकते रहते हैं। निश्चित दिशा न होने से

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संकटों का प्रधान कारण और निवारण (The root cause of troubles and their solution)

Published on September 17th, 2013

संकटों का प्रधान कारण और निवारण

 

सदाचरण से आत्म-विश्वास की प्राप्ति (Self-Confidence Achieved Through Conduct)

Published on August 4th, 2013

                                      “सदाचरण से आत्म-विश्वास की प्राप्ति सदाचरण से व्यक्ति में आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है, जिससे वह श्रेष्ठ कार्यों में निष्ठापूर्वक अग्रसर हो सके, भले ही परिस्थितियाँ विकराल रूप धारण करके सामने क्यों न खड़ी हों । महात्मा लूथर की यह घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है- ‘मुझे खेद है कि मेरे पास एक सिर है, यदि

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आत्म-संतोष की उपलब्धि (Achievement of Self-satisfaction)

Published on August 1st, 2013

                                              “आत्म-संतोष की उपलब्धि आत्म-संतोष मानव-जीवन की महानतम उपलब्धि है। इसे प्राप्त करने के लिए उच्चस्तरीय चरित्र की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। कुटिलतापूर्वक अनीति अपनाकर कोई व्यक्ति तात्कालिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले पर आत्मग्लानि और आत्म प्रताड़ना की आग में सदा ही झुलसते रहना पड़ेगा। आत्मग्लानि-तिरस्कार

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चरित्र और धन (Character and Wealth)

Published on July 20th, 2013

                                                      “चरित्र और धन सच्चरित्रता अपने में एक महान संपदा है। महापुरुषों के पास सबसे बड़ी पूँजी उनके चरित्र की ही होती है, जिसके सहारे वे निरंतर अपने प्रगति पथ पर बढ़ते जाते हैं। चरित्र की महत्ता धन संपदा से कहीं अधिक बढ़कर है। महाभारतकार ने भी लिखा है- ‘वृत्तं यत्नेन संरक्षेत् वित्तमेति च याति

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चरित्र एक सर्वोपरि संपदा (Character: A Paramount Asset)

Published on July 18th, 2013

                                                “चरित्र एक सर्वोपरि संपदा चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और संपदा है। संसार की अनंत संपदाओं के स्वामी होने पर भी यदि कोई चरित्रहीन है तो वह हर अर्थ में विपन्न ही माना जाएगा। निर्धन एवं साधनहीन होने पर चरित्रवान का मस्तक समाज में सदैव ऊँचा रहता है, उसकी आँखों में चमक और

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अभिभावकों का उत्तरदायित्व (Parents’ Responsibilities)

Published on July 17th, 2013

                                                  अभिभावकों का उत्तरदायित्व  बहुत से माँ-बाप तो बच्चों को पैदा करने, खिलाने-पिलाने, स्कूल आदि में पढ़ने की व्यवस्था तक ही अपने उत्तरदायित्व की इतिश्री समझते हैं किंतु इससे बच्चों के निर्माण की संपूर्ण समस्या का हल नहीं होता, हालांकि बच्चों के विकास में इनका भी अपना स्थान है। बच्चों में अच्छी आदतें डालना,

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