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नवयुवक सज्जनता और शालीनता सीखें (Youth must learn humility and decency)

Published on July 31st, 2012

“नवयुवक सज्जनता और शालीनता सीखें कहना न होगा कि समस्त समृद्धि, प्रगति और शान्ति का सद्भाव मनुष्य के सद्गुणों पर अवलम्बित है । दुर्गुणी व्यक्ति हाथ में आई हुई, उत्तराधिकार में मिली हुई समृद्धियों को गवाँ बैठते हैं और सद्गुणी गई-गुजरी परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रगति के हजार मार्ग प्राप्त कर लेते हैं ।

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अनीति से सतर्क रहें, अन्याय को रोकें (Be on the alert for any wrongdoings and stop injustice)

Published on June 18th, 2012

अनीति से सतर्क रहें, अन्याय को रोकें

मुक्ति का अर्थ (Meaning of Salvation)

Published on May 29th, 2012

मुक्ति का अर्थ

ईश्वर के भौतिक स्वरूप (The Physical Form of the God)

Published on January 2nd, 2012

ईश्वर के भौतिक स्वरूप

भाग्यवाद की आवश्यकता किस लिए ? (What is the need to believe in destiny ?)

Published on December 31st, 2011

भाग्यवाद की आवश्यकता किस लिए ? एक ही औषधि हर मर्ज पर हर व्यक्ति के लिए काम नहीं आ सकती । इसी प्रकार परिस्थितियों के अनुरूप अनेक सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है । भाग्यवाद का सिद्धांत भी एक ऐसा ही प्रयोग है जो केवल तब काम में लाया जाता है, जब मनुष्य के पुरुषार्थ

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विभूतिवान लोकरंजन में नहीं सृजन में लगेंगे (The Genius will engage in Development, Not in Mass Entertainment )

Published on December 16th, 2011

विभूतिवान लोकरंजन में नहीं सृजन में लगेंगे साहित्यकार अगले दिनों लोकरंजन के लिए नहीं लिखेंगे । उन्हें माता सरस्वती से वेश्यावृति कराने में ग्लानि अनुभव होगी और कलम का उपयोग जनमानस को पाप पंक में धकेलते हुए उनकी आत्मा रोयेगी । आत्मग्लानि से प्रताडि़त साहित्यकार अब दिनोंदिन लोकमंगल की दिशा में बढ़ेगा । कलाकार, कवि,

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सजीव प्रचारक (A Missionary, an Active Agent for Spreading Messages)

Published on December 8th, 2011

सजीव प्रचारक बुरे आदमी बुराई के सक्रिय सजीव प्रचारक होते हैं । वे अपने आचरणों द्वारा बुराईयों की शिक्षा लोगों को देते हैं । उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा । कुछ लोग धर्म-प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें

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संगठन की महान शक्ति (Great Strength of Unity)

Published on December 3rd, 2011

संगठन की महान शक्ति कहते हैं कि निर्जीव चीजें एक और एक दो होती हैं किन्तु जीवित मनुष्य यदि सच्चेपन से एक दूसरे को प्रेम करें और एकता की सुदृढ़ भावना में संबद्ध हों तो वे एक और एक मिलकर ग्यारह बन जाते हैं । उनकी शक्ति का परिणाम अनेक गुना अधिक बन जाता है

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हमें स्वयं ही विभूतिवान सिद्ध होना होगा (We must prove ourselves to be excellent)

Published on December 1st, 2011

हमें स्वयं ही विभूतिवान सिद्ध होना होगा

सम्पत्ति ही नहीं सदबुद्धि भी (Not only wealth but also intelligence)

Published on November 30th, 2011

  सम्पत्ति ही नहीं सदबुद्धि भी

 
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