ईश्वर के भौतिक स्वरूप
Archive for the ‘Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66’ Category:
विभूतिवान लोकरंजन में नहीं सृजन में लगेंगे (The Genius will engage in Development, Not in Mass Entertainment )
विभूतिवान लोकरंजन में नहीं सृजन में लगेंगे साहित्यकार अगले दिनों लोकरंजन के लिए नहीं लिखेंगे । उन्हें माता सरस्वती से वेश्यावृति कराने में ग्लानि अनुभव होगी और कलम का उपयोग जनमानस को पाप पंक में धकेलते हुए उनकी आत्मा रोयेगी । आत्मग्लानि से प्रताडि़त साहित्यकार अब दिनोंदिन लोकमंगल की दिशा में बढ़ेगा । कलाकार, कवि,
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हमें स्वयं ही विभूतिवान सिद्ध होना होगा (We must prove ourselves to be excellent)
हमें स्वयं ही विभूतिवान सिद्ध होना होगा
सम्पत्ति ही नहीं सदबुद्धि भी (Not only wealth but also intelligence)
सम्पत्ति ही नहीं सदबुद्धि भी
भौतिकता और आध्यात्मिकता की आवश्यकता (Necessity of Materialism and Spirituality)
भौतिकता और आध्यात्मिकता की आवश्यकता भौतिकता और आध्यात्मिकता परस्पर दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं । एक के बिना दूसरी अधूरी है । जंगल में गुफा में रहने वाले विरक्त महात्मा का भी भोजन, प्रकाश, माला, कमण्डल, आसन, खड़ाऊँ, पुस्तक, कम्बल, आग आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहेगी ही, इनके बिना उसका जीवित रहना भी सम्भव
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हम कामनाग्रस्त न हों – प्रगतिशील बनें (Do not build castles in air – be wise and strive for progress)
हम कामनाग्रस्त न हों – प्रगतिशील बनें प्रगति की आकांक्षा और लालसाओं की पूर्ति का सामान्य स्वरूप एक-सा दीखता है, पर बारीकी से देखने पर इनमें जमीन-आसमान का अन्तर मिलेगा । प्रगतिशीलता और कामनाग्रस्त का आरम्भिक उत्साह एक जैसा लगता है पर वस्तुत: दोनों की दो दिशाएँ और परिणाम भी एक दूसरे से विपरीत ही
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